Breaking Nes : पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को चार्जफ्रेम मामले में झटका, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
रांची: झारखंड के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम को टेंडर आवंटन से जुड़े कथित कमीशन और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अदालत से झटका लगा है। झारखंड हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ निचली अदालत द्वारा चार्ज फ्रेम किए जाने के आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। मामले में आलमगीर आलम की ओर से पहले निचली अदालत में डिस्चार्ज आवेदन दाखिल किया गया था। विशेष PMLA अदालत, रांची ने 3 दिसंबर 2024 को उनका डिस्चार्ज आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद 7 दिसंबर 2024 को उनके खिलाफ आरोप तय यानी चार्ज फ्रेम किया गया। आलमगीर आलम ने इन दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने मामले में उपलब्ध दस्तावेजों और अभियोजन की ओर से प्रस्तुत सामग्री की समीक्षा के बाद उनकी याचिका खारिज कर दी। अदालत ने अपने फैसले में चार्ज फ्रेम करने के चरण से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट किया। कोर्ट के मुताबिक इस चरण में यह देखा जाता है कि आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री मौजूद है या नहीं। इस स्तर पर अदालत को सबूतों की ऐसी विस्तृत जांच नहीं करनी होती, जैसी मुकदमे के अंतिम चरण में की जाती है। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि रिकॉर्ड में प्रथम दृष्टया अपराध से जुड़ी पर्याप्त सामग्री मौजूद है, तो केवल इस आधार पर आरोपी को डिस्चार्ज नहीं किया जा सकता। दोषी या निर्दोष होने का अंतिम फैसला ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होगा। यह मामला ग्रामीण विकास विभाग में टेंडर आवंटन से जुड़े कथित कमीशन नेटवर्क की जांच से जुड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में पूर्व मंत्री आलमगीर आलम, उनके तत्कालीन आप्त सचिव संजीव कुमार लाल और अन्य लोगों की भूमिका को लेकर आरोप लगाए गए हैं। ईडी का आरोप है कि सरकारी विभागों में टेंडर आवंटन के बदले कथित तौर पर कमीशन की रकम वसूली जाती थी और इस नेटवर्क में कई लोग जुड़े हुए थे। जांच के दौरान एजेंसी ने विभिन्न स्थानों पर छापेमारी और नकदी बरामदगी की कार्रवाई भी की थी। ईडी ने 15 मई 2024 को तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम को गिरफ्तार किया था। इससे पहले उनके आप्त सचिव संजीव कुमार लाल और अन्य सहयोगियों के ठिकानों पर कार्रवाई की गई थी। ईडी की कार्रवाई के दौरान संजीव कुमार लाल से जुड़े ठिकाने से नकदी और एक डायरी मिलने की बात सामने आई थी। वहीं, जहांगीर आलम से जुड़े परिसर से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने की रिपोर्ट सामने आई थी। इन बरामदगी और जांच से जुड़े दस्तावेजों को ईडी ने अपने मामले का हिस्सा बनाया। हाईकोर्ट द्वारा चार्जफ्रेम के खिलाफ याचिका खारिज किए जाने का अर्थ यह है कि निचली अदालत में मामले की सुनवाई आगे बढ़ने का रास्ता खुला रहेगा। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियां प्रथम दृष्टया विचार के स्तर पर हैं और ट्रायल कोर्ट मामले का फैसला कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से करेगा। इसलिए हाईकोर्ट के इस आदेश को आलमगीर आलम की दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। मामले में आरोपों की अंतिम पुष्टि ट्रायल और साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद ही होगी। इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में आलमगीर आलम को जमानत दे दी थी। इससे पहले अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने से इनकार करते हुए महत्वपूर्ण गवाहों की जांच चार सप्ताह में पूरी करने का निर्देश दिया था। बाद में 11 मई को उन्हें जमानत मिलने की रिपोर्ट सामने आई। हाईकोर्ट से चार्जफ्रेम के खिलाफ राहत नहीं मिलने के बाद मामले की ट्रायल प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। अब अदालत में अभियोजन पक्ष के साक्ष्य, गवाहों की गवाही और बचाव पक्ष की दलीलों के आधार पर मामले की आगे की सुनवाई होगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि चार्ज फ्रेम होना दोष साबित होना नहीं है। अदालत ने फिलहाल केवल यह माना है कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर मुकदमा आगे चलने के लिए पर्याप्त प्रथमदृष्टया आधार है। अंतिम फैसला ट्रायल के बाद ही होगा।डिस्चार्ज आवेदन खारिज होने के बाद फ्रेम हुआ था चार्ज
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
ईडी ने लगाया है कमीशन लेने का आरोप
2024 में हुई थी गिरफ्तारी
हाईकोर्ट के आदेश का क्या असर होगा?
बाद में सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत
अब आगे क्या?












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