बार-बार प्राकृतिक आपदाओं से घायल हो रहा भागलपुर, बुनियादी ढांचे की कमजोरी और मानवीय लापरवाही ने बढ़ाया संकट
भागलपुर, बिहार का भागलपुर जिला इन दिनों एक बार फिर प्रकृति के भीषण प्रहार और प्रशासनिक विफलता के दोहरे संकट से जूझ रहा है। गंगा और उसकी सहायक नदियों के बढ़ते जलस्तर, तेज कटाव और तटबंधों पर बढ़ते दबाव ने पूरे जिले को सहमा दिया है।
सितंबर महीने में जिले के कई इलाकों में तटबंध टूटने से बाढ़ की स्थिति भयावह हो गई है। लेकिन यह पहली बार नहीं है; बुनियादी ढांचे की मजबूती, तट सुरक्षा और आपदा से निपटने की तैयारियों पर उठ रहे गंभीर सवाल अब स्थानीय प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।
भागलपुर की भौगोलिक स्थिति जहां इसका सबसे बड़ा गौरव है, वहीं इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी बन चुकी है। कुछ महीने पहले, 3 मई की रात, जिले की जीवनरेखा कहे जाने वाले विक्रमशिला सेतु का करीब 33 मीटर का एक बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर गंगा नदी में समा गया था।
इस हादसे के बाद नवगछिया और सीमांचल के इलाकों से संपर्क पूरी तरह टूट गया, जिससे दूध, सब्जी, केला और मछली जैसी रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप हो गई।
हालांकि सरकार ने तत्काल जांच और मरम्मत के निर्देश दिए थे, लेकिन बाढ़ के पानी के कारण काम में देरी हो रही है। मशीनें साइट पर पहुंचने के बावजूद काम शुरू न हो पाना आपदा के बीच दीर्घकालिक रणनीति के अभाव को दर्शाता है।
हर साल आने वाली बाढ़ और कटाव को सिर्फ 'प्राकृतिक आपदा' कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, राघोपुर बांध के आसपास नदी के बढ़ते दबाव को लेकर तकनीकी विशेषज्ञों ने वर्षों पहले चेतावनी दी थी।
इसके बावजूद समय रहते सुरक्षात्मक कदम नहीं उठाए गए। यह मानवीय लापरवाही और लचर तैयारियों का ही नतीजा है कि आज दियारा क्षेत्र की एक बड़ी आबादी अपने घर, खेत और आजीविका बचाने के लिए दर-दर भटक रही है।
आपदा के इस हाहाकार के बीच कहलगांव से आई एक तस्वीर ने पूरी व्यवस्था की संवेदनशीलता को तार-तार कर दिया है। यहां सार्वजनिक स्थल पर लगा राष्ट्रीय ध्वज क्षतिग्रस्त पाया गया, जो घंटों तक जिम्मेदारों की नजरों से दूर पड़ा रहा। इस पर कुछ अधिकारियों की बचकानी दलीलों ने आग में घी का काम किया है।
स्थानीय राष्ट्रप्रेमियों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। नागरिकों का कहना है, "राष्ट्रीय ध्वज कोई मामूली कपड़ा नहीं, बल्कि शहीदों की आन-बान-शान और देश का गौरव है। आपदा के समय भी ऐसी लापरवाही अक्षम्य है। हमें उन लोगों पर शर्म आती है जो इसे हल्के में ले रहे हैं।
भागलपुर की त्रासदी सिर्फ बाढ़ का आना नहीं है, बल्कि हर आपदा के बाद जागने की प्रशासनिक आदत है। जिले को अब अस्थायी कम्युनिटी किचन और नावों के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता।
विशेषज्ञों के अनुसार, भागलपुर को बचाने के लिए संवेदनशील तटबंधों और कटाव वाले क्षेत्रों का तुरंत साइंटिफिक सर्वे हो। पुराने पुलों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों का नियमित रूप से स्ट्रक्चरल ऑडिट किया जाए। जिन इलाकों में पहले से खतरे की चेतावनी दी गई है, वहां सुरक्षा कार्य प्राथमिकता के आधार पर पूरे हों।
अगर इन चेतावनियों को महज प्राकृतिक संयोग मानकर भुला दिया गया, तो अगली बार नुकसान इससे भी कहीं अधिक भयावह होगा। भागलपुर को अब मरम्मत नहीं, बल्कि एक ठोस और स्थायी समाधान की दरकार है।
प्रदेश महामंत्री डॉ प्रीति शेखर ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के संयुक्त प्रयासों से केंद्रीय टीम ने भागलपुर समेत पूरे बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाकों का दौरा किया है। आने वाले दिनों में बाढ़ से बचाव के लिए ठोस एवं स्थाई समाधान किए जाएंगे।
कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता ज्योति कुमार सिंह ने बातचीत में कहा कि दिल्ली और बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार है। फिर भी समस्या का स्थाई समाधान नहीं है। ये सरकार लूट के लिए आपदा का इंतजार करती है। विपक्षी पार्टियों और विशेषज्ञों के द्वारा बार अगाह किए जाने के बावजूद इसका स्थाई समाधान नहीं किया जाता है। मतलब एक ही आपदा को अवसर समझकर लूटना है।













