अयोध्या की तर्ज पर विकसित होगा सीतापुर का नैमिषारण्य, बनेगा भव्य वैदिक नगरी का स्वरूप
50 हजार प्राचीन एवं धार्मिक पुस्तकों वाला डिजिटल-वैदिक ग्रंथालय बनेगा- चारों वेदों को समर्पित होगा ‘वेद मंदिर’-वेद विज्ञान केंद्र में वेधशाला और तारामंडल की होगी स्थापना-300 विद्यार्थियों के लिए बनेगा छात्रावास
लखनऊ, उत्तर प्रदेश का नैमिषारण्य केवल एक प्राचीन तीर्थस्थल ही नहीं, बल्कि सनातन परंपरा में आस्था, ज्ञान और तपस्या की महत्वपूर्ण भूमि के रूप में प्रतिष्ठित है। सीतापुर जिले में गोमती नदी के तट पर स्थित इस पौराणिक तीर्थ को अब अयोध्या की तर्ज पर विकसित कर भव्य वैदिक नगरी का स्वरूप देने की दिशा में काम तेज किया गया है। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने नैमिषारण्य तीर्थ परिषद का गठन कर धार्मिक, सांस्कृतिक और बुनियादी सुविधाओं के योजनाबद्ध विकास की प्रक्रिया शुरू की है।
राजधानी लखनऊ से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित नैमिषारण्य लंबे समय से देश-विदेश के श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहा है। मान्यता है कि यहां साढ़े तीन करोड़ तीर्थ और तैंतीस कोटि देवताओं का वास है। सरकार की योजनाओं के पूरा होने के बाद श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलने के साथ क्षेत्र की धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को भी नया विस्तार मिलने की उम्मीद है।
88 हजार ऋषियों की तपोभूमि की मान्यता
नैमिषारण्य के नामकरण और इसकी महत्ता से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, जब 88 हजार ऋषि-मुनियों ने ब्रह्माजी से कलियुग के प्रभाव से मुक्त ऐसी तपोभूमि के बारे में पूछा, जहां वे निरंतर साधना कर सकें, तब ब्रह्माजी ने एक चक्र छोड़ा। वह चक्र जिस स्थान पर रुका, वहां चक्र के आकार का कुंड बन गया। चक्र की 'नेमि' (धुरी/नेम) यहीं पर गिरी थी, जिस कारण इस स्थान का नाम नैमिषारण्य (नेमि + आरण्य) पड़ा।
वेद-पुराणों में भी इसे 88 हजार ऋषियों की तपस्या और ज्ञान की स्थली के रूप में वर्णित किया गया है। धार्मिक मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने यहीं वेदों का विभाजन किया और पुराणों की रचना तथा उनका पाठ किया। महाभारत सहित वायु पुराण और मार्कंडेय पुराण जैसे विभिन्न ग्रंथों में भी नैमिषारण्य का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि महाभारत की कथा का महत्वपूर्ण हिस्सा भी यहीं ऋषियों की प्रेरणा से सूतजी ने सुनाया था।
सीतापुर निवासी डॉ. जितेंद्र प्रकाश मिश्र के अनुसार, नैमिषारण्य में दर्शन और पूजा-अर्चना के साथ व्यक्ति को अपने जीवन के आध्यात्मिक संशयों से मुक्ति का अवसर भी मिलता है। उन्होंने कहा कि बचपन से इस तीर्थ की महिमा सुनते आए हैं और समय के साथ यहां लोगों की आस्था लगातार बढ़ी है। सुबह आश्रमों और मंदिरों से सुनाई देने वाली घंटियों तथा श्लोकों की गूंज से आज भी इस क्षेत्र की प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा का अनुभव किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, दधीचि ऋषि ने नैमिषारण्य में सभी देवताओं के दर्शन किए और परिक्रमा के बाद अपनी अस्थियों का दान किया था। इसी मान्यता के कारण श्रद्धालु आज भी 84 कोसीय परिक्रमा के लिए देश-विदेश से यहां पहुंचते हैं।
विकास और सौंदर्यीकरण को मिली गति
वर्ष 2017 में प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद नैमिषारण्य तीर्थ क्षेत्र के विकास और सौंदर्यीकरण के लिए विभिन्न योजनाओं पर काम तेज हुआ है। सरकार ने इसके लिए बजट में लगातार धनराशि का प्रावधान किया है। करीब 100 करोड़ रुपये के विशेष आवंटन के साथ विभिन्न चरणों में विकास परियोजनाएं प्रस्तावित और संचालित हैं।
प्रमुख योजनाओं में चक्रतीर्थ, मां ललिता देवी मंदिर और गोमती नदी के घाटों का जीर्णोद्धार एवं सौंदर्यीकरण शामिल है। मां ललिता देवी मंदिर से चक्रतीर्थ होते हुए राजघाट तक नए कॉरिडोर के प्रस्ताव पर भी काम किया जा रहा है। इसके अलावा 3.72 करोड़ रुपये की लागत से पुरानी धर्मशाला को आधुनिक ‘पिलग्रिम इंटरप्रिटेशन सेंटर’ में विकसित किया जा रहा है।
बनेगा वेद विज्ञान केंद्र
नैमिषारण्य में भारतीय प्राचीन विद्या और संस्कृति के संरक्षण तथा अध्ययन को संस्थागत स्वरूप देने के लिए वेद विज्ञान केंद्र की स्थापना की जा रही है। राज्य सरकार ने इसके लिए 100 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया है। केंद्र की स्थापना के लिए भूमि आवंटित करने के साथ 25 करोड़ रुपये की धनराशि जारी किए जाने की जानकारी दी गई है।
प्रस्तावित केंद्र में गुरुकुल परंपरा के अनुरूप कक्षाएं संचालित की जाएंगी, जहां वेद, पुराण और प्राचीन शास्त्रों का अध्ययन कराया जाएगा। वेद और वैदिक विज्ञान से जुड़े विभिन्न विषयों पर उच्चस्तरीय अध्ययन एवं शोध के साथ शोध कार्यों के प्रकाशन की भी योजना है।
केंद्र में खगोलशास्त्र के विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए आधुनिक वेधशाला और तारामंडल की स्थापना की जाएगी। वास्तुशास्त्र में मास्टर प्रोग्राम जैसे पाठ्यक्रम संचालित करने की भी योजना है।
चारों वेदों को समर्पित होगा ‘वेद मंदिर’
वेद विज्ञान केंद्र परिसर में चारों वेदों को समर्पित ‘वेद मंदिर’ का निर्माण भी प्रस्तावित है। इसमें चारों वेदों के स्वरूप को पुस्तकों और प्रतिमाओं के माध्यम से प्रदर्शित किया जाएगा। इसके अलावा 50 हजार प्राचीन एवं धार्मिक पुस्तकों वाला बड़ा डिजिटल और वैदिक ग्रंथालय विकसित करने की योजना है। केंद्र में करीब 300 विद्यार्थियों के रहने की क्षमता वाला छात्रावास भी बनाया जाएगा।
केंद्र की स्थापना से जुड़ी कार्ययोजना में शामिल संस्कृत भाषा के विद्वान और नव नालंदा महाविहार, नालंदा के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रोफेसर विजय कुमार कर्ण ने बताया कि प्रस्तावित केंद्र में विश्वस्तरीय पोस्ट-डॉक्टोरल शोध की व्यवस्था विकसित करने की योजना है। उन्होंने बताया कि परिसर में ऋषि-मुनियों के नाम पर पौधे लगाए जाएंगे। कार्ययोजना को अंतिम रूप देने के लिए संबंधित स्तर पर बैठकें हो चुकी हैं और आगे भी बैठकें प्रस्तावित हैं।
कनेक्टिविटी को भी किया जा रहा मजबूत
नैमिषारण्य को देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों से बेहतर तरीके से जोड़ने और श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़ाने के लिए कनेक्टिविटी से जुड़ी परियोजनाओं पर भी काम किया जा रहा है। इनमें हेलीपैड/हेलीपोर्ट का निर्माण, इलेक्ट्रिक बसों का संचालन और फोरलेन सड़कों का विकास शामिल है। गाजियाबाद-सीतापुर रेल मार्ग के माध्यम से भी क्षेत्र को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ने की योजना है। राजधानी लखनऊ से नैमिषारण्य की सीधी कनेक्टिविटी पहले ही विकसित की जा चुकी है।
धार्मिक और पौराणिक स्थलों का समृद्ध संसार
नैमिषारण्य का पूरा तीर्थ क्षेत्र ही धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां चक्रतीर्थ, मां ललिता देवी मंदिर, भूतेश्वरनाथ मंदिर, व्यास गद्दी, सूत गद्दी, मनु-सतरूपा तपस्थली, हनुमानगढ़ी, चारधाम मंदिर, काशी कुंड तीर्थ, देवपुरी, काशी विश्वनाथ मंदिर, रुद्रावर्त तीर्थ, देवदेवेश्वर, संत आपानारायण स्वामी समाधि स्थल, बालाजी मंदिर, त्रिशक्ति धाम, हत्याहरण तीर्थ, कालिका देवी और काली पीठ सहित अनेक प्रमुख धार्मिक एवं दर्शनीय स्थल हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार की विकास योजनाओं के साथ नैमिषारण्य में धार्मिक पर्यटन, प्राचीन ज्ञान परंपरा, वैदिक अध्ययन और आधुनिक सुविधाओं को एक साथ विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रस्तावित वेद विज्ञान केंद्र, वेद मंदिर, डिजिटल ग्रंथालय, वेधशाला और तारामंडल जैसी परियोजनाओं के जरिए इस प्राचीन तपोभूमि को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ते हुए उसकी वैदिक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।














