गुरु-शिष्य परंपरा ज्ञान और संस्कारों की आधारशिला है : प्रो. डी.सी. श्रीवास्तव
कानपुर, भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु केवल शिक्षा देने वाला
नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा प्रदान करने वाला पथप्रदर्शक होता है। गुरु
पूर्णिमा हमें ज्ञान, अनुशासन, सेवा और संस्कारों के प्रति समर्पित रहने की
प्रेरणा देती है। यह बातें बुधवार को छत्रपति शाहू जी महाराज
विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के दीनदयाल शोध केंद्र के निदेशक प्रो. डी.सी.
श्रीवास्तव ने व्यास जयंती (गुरु पूर्णिमा) कार्यक्रम में कहीं।
विश्वविद्यालय में कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक के निर्देशन में व्यास
जयंती (गुरु पूर्णिमा) श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई। दीनदयाल शोध
केंद्र में आयोजित मुख्य कार्यक्रम का शुभारंभ महर्षि वेदव्यास के पूजन एवं
पुष्पार्चन से हुआ। इस अवसर पर वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु
की सर्वोच्च प्रतिष्ठा तथा महर्षि वेदव्यास के योगदान का स्मरण करते हुए
कहा कि उन्होंने वेदों का संहिताकरण, महाभारत और अठारह पुराणों की रचना कर
भारतीय ज्ञान-संपदा को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया तथा गुरु-शिष्य परंपरा
को सुदृढ़ आधार दिया।
कार्यक्रम में आचार्य डॉ. श्रवण कुमार
द्विवेदी, संगम बाजपेयी तथा अन्य शिक्षकों की उपस्थिति रही। दीनदयाल शोध
केंद्र के डिप्लोमा इन कर्मकाण्ड, स्नातकोत्तर डिप्लोमा इन वास्तुशास्त्र
और स्नातकोत्तर ज्योतिर्विज्ञान पाठ्यक्रमों के लगभग 100 विद्यार्थियों ने
गुरु वंदना, वैदिक मंत्रोच्चार और भारतीय संस्कृति पर आधारित विचार-विमर्श
में सहभागिता की। समापन पर भारतीय संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और भारतीय
ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन का संकल्प दोहराया गया।
इसी
क्रम में विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में भी गुरु
पूर्णिमा श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाई गई। विभागाध्यक्ष डॉ. दिवाकर
अवस्थी ने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल शिक्षकों के सम्मान का पर्व नहीं,
बल्कि जीवन को दिशा देने वाले सभी गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का
अवसर है। उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन
में माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु और परम गुरु का विशेष स्थान होता
है तथा सभी के आदर्शों का सम्मान और अनुसरण करना चाहिए।
कार्यक्रम
का समन्वय डॉ. हरिओम कुमार ने किया। इस अवसर पर छात्र-छात्राओं ने गुरु
पूर्णिमा के महत्व को समझते हुए अपने गुरुओं के प्रति सम्मान और कृतज्ञता
व्यक्त की। विश्वविद्यालय में आयोजित दोनों कार्यक्रमों के माध्यम से
गुरु-शिष्य परंपरा, भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा के संरक्षण तथा जीवन
में संस्कारों के महत्व का संदेश दिया गया।














