अमेरिका से साझेदारी, पर भारत किसी के दबाव में नहीं - डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत और अमेरिका आज विश्व की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारियों में से एक हैं। रक्षा, व्यापार, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, सेमीकंडक्टर और हिंद-प्रशांत सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है और दोनों देशों के बीच आर्थिक तथा सामरिक सहयोग नई ऊंचाइयों तक पहुंचा है।
इसके बावजूद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में एच-1बी वीजा, टैरिफ, प्रवासन नीति और बाजार पहुंच जैसे मुद्दों पर अमेरिका ने कई बार भारत पर दबाव बनाने का प्रयास किया। किंतु भारत ने इन चुनौतियों के सामने झुकने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और विविधीकरण की नीति को और मजबूत किया। यही वह परिवर्तन है जिसने दुनिया को दिखाया कि नया भारत साझेदारी करता है, लेकिन किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहता।
पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा आधार रणनीतिक स्वायत्तता बनकर उभरा है। भारत अब महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए निर्णय लेता है। रूस-यूक्रेन युद्ध इसका प्रमुख उदाहरण है। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीद जारी रखी और अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की। इस कदम ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब अपने हितों के आधार पर निर्णय लेने वाला स्वतंत्र शक्ति केंद्र बन चुका है।
ट्रंप प्रशासन की “अमेरिका फर्स्ट” नीति के कारण भारतीय आईटी पेशेवरों और उद्योग जगत में चिंता बढ़ी। एच-1बी वीजा नियमों को सख्त करने और व्यापारिक मामलों में दबाव बढ़ाने जैसे कदम भारत के लिए चुनौती थे। लेकिन भारत ने इनका उत्तर टकराव से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति से दिया। भारत ने यह समझ लिया कि किसी एक देश या आपूर्ति स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। इसलिए उसने विविधीकरण को अपनी नीति का प्रमुख आधार बनाया।
ऊर्जा क्षेत्र में भारत ने व्यापक बदलाव किए। पहले जहां तेल आपूर्ति के लिए सीमित स्रोतों पर निर्भरता थी, वहीं अब भारत ने विभिन्न देशों के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाकर अपनी स्थिति मजबूत की है। इसका परिणाम यह हुआ कि रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट जैसी परिस्थितियों के बावजूद भारत की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित नहीं हुई। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी भारत ने आत्मनिर्भरता और विविधीकरण दोनों को महत्व दिया। कोविड महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि चिकित्सा उपकरणों और स्वास्थ्य आपूर्ति के लिए किसी एक देश पर निर्भरता खतरनाक हो सकती है। इसी कारण भारत ने विभिन्न देशों के साथ सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूत करने पर जोर दिया। “मेक इन इंडिया” के तहत मेडिकल उपकरणों के निर्माण को प्रोत्साहन दिया गया और स्वास्थ्य क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।
फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में भारत पहले से ही विश्व की प्रमुख दवा उत्पादक शक्ति है, लेकिन सक्रिय औषधीय सामग्री (एपीआई) के लिए बाहरी निर्भरता एक चुनौती थी। इसे कम करने के लिए भारत ने घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया और नई साझेदारियों का विस्तार किया। इससे न केवल आयात पर निर्भरता कम हुई, बल्कि वैश्विक दवा उद्योग में भारत की स्थिति और मजबूत हुई।
तकनीक और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भी भारत ने दूरदर्शी नीति अपनाई है। वैश्विक स्तर पर चिप्स और इलेक्ट्रॉनिक्स की बढ़ती मांग को देखते हुए भारत ने प्रमुख तकनीकी देशों के साथ सहयोग बढ़ाया है। देश में स्थापित हो रही सेमीकंडक्टर परियोजनाएं इस बात का संकेत हैं कि भारत भविष्य की तकनीकी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है। इसका उद्देश्य केवल आयात कम करना नहीं, बल्कि भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना भी है।
रक्षा क्षेत्र में भारत की नीति संतुलन और स्वायत्तता का उत्कृष्ट उदाहरण है। अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ भारत ने रूस, फ्रांस, इजरायल और अन्य देशों के साथ भी अपने संबंध बनाए रखे हैं। इस बहुआयामी रणनीति ने भारत को किसी एक शक्ति केंद्र पर अत्यधिक निर्भर होने से बचाया है और उसकी सामरिक क्षमता को मजबूत किया है।
खाद्य सुरक्षा, उर्वरक और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में भी भारत ने विविधीकरण को प्राथमिकता दी है। भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक लिथियम, कोबाल्ट और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु विभिन्न देशों के साथ रणनीतिक सहयोग विकसित किया गया है। इससे भारत की औद्योगिक और तकनीकी जरूरतों को दीर्घकालिक आधार मिला है।
व्यापार और निवेश के क्षेत्र में भी भारत ने नए अवसरों का विस्तार किया है। विभिन्न देशों और क्षेत्रों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों, निवेश सहयोग और सप्लाई चेन साझेदारियों के माध्यम से भारत ने अपने आर्थिक विकल्पों को व्यापक बनाया है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा जैसी पहलें इसी सोच का हिस्सा हैं, जिनका उद्देश्य भारत को वैश्विक व्यापार और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का महत्वपूर्ण केंद्र बनाना है।
आज भारत दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि मित्रता और निर्भरता में स्पष्ट अंतर होता है। अमेरिका भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है और भविष्य में भी रहेगा, लेकिन भारत अब अपने राष्ट्रीय हितों को किसी भी रिश्ते से ऊपर रखता है। चाहे रूस से तेल खरीदने का मामला हो, वैश्विक संघर्षों पर स्वतंत्र रुख अपनाने का प्रश्न हो या व्यापारिक दबावों का सामना करना हो, भारत ने हर बार अपने हितों के अनुरूप निर्णय लिए हैं।
भारत और अमेरिका के संबंध आगे भी मजबूत होंगे, किंतु अब यह संबंध बराबरी, सम्मान और पारस्परिक हितों पर आधारित होंगे। नया भारत सहयोग और मित्रता को महत्व देता है, लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों की कीमत पर कोई समझौता नहीं करता। यही उसकी विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता है और यही संदेश आज विश्व समुदाय भी स्पष्ट रूप से महसूस कर रहा है, इसलिए अमेरिका को ट्रंप प्रशासन के दबाव में या कहें निर्देशन में जो निर्णय लेना है वह लेता रहे, भारत अपने हित के लिए पहले भी अडिग रूप से खड़ा था और जैसा कि वर्तमान विदेश नीति मोदी सरकार की दिख रही है, उसके नजरिए से कहें तो आगे भी डटा रहेगा!














