इंदौर नगर निगम के 103 करोड़ के टेंडर घोटाले में कारोबारी राहुल बडेरा और इंजीनियर की जमानत खारिज
इंदौर, मध्य प्रदेश के इंदौर नगर निगम में फर्जी टेंडर और वर्क
ऑर्डर जारी कर करीब 103 करोड़ रुपये की सरकारी राशि को अपराध की आय के रूप
में अर्जित करने के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बुधवार को ईडी की विशेष
पीएमएलए न्यायालय ने कारोबारी राहुल बडेरा और नगर निगम के तत्कालीन
जिम्मेदार अधिकारी अभय सिंह राठौर की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं।
दोनों
आरोपितों की ओर से धारा 483 बीएनएसएस के तहत पहली जमानत अर्जी पेश की गई
थी। बुधवार को विशेष न्यायाधीश (पीएमएलए) इंदौर राजेंद्र कुमार पाटीदार ने
दोनों मामलों में आदेश पारित किया। न्यायालय ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद
सामग्री के आधार पर आरोपियों के खिलाफ गंभीर आर्थिक अपराध से जुड़े आरोप
हैं। इस स्तर पर यह मानने का पर्याप्त आधार नहीं है कि वे अपराध के दोषी
नहीं हैं।
फर्जी टेंडर निकालकर जारी किए वर्क ऑर्डर
प्रवर्तन
निदेशालय (ईडी) की ओर से न्यायालय में पेश किए गए जवाब के मुताबिक, आरोप
है कि नगर निगम इंदौर में आरोपितों ने आपस में मिलकर फर्जी टेंडर और फर्जी
वर्क ऑर्डर जारी किए। इन वर्क ऑर्डर के जरिए जारी सरकारी राशि को आपस में
बांटकर करीब 103 करोड़ रुपये की राशि अपराध की आय के रूप में अर्जित की गई।
ईडी का कहना है कि वास्तव में इन टेंडरों के अनुसार कोई काम नहीं हुआ।
31 आरोपितों के खिलाफ 24 जुलाई को दाखिल हुआ था परिवाद
गौरतलब
है कि मामले में ईडी ने जांच पूरी करने के बाद 24 जुलाई 2026 को 31
आरोपितों के खिलाफ पीएमएलए की धारा 3 सहपठित धारा 4 के तहत परिवाद पेश किया
था। इस मामले में संज्ञान पर बहस के लिए 21 सितंबर 2026 की तारीख तय की गई
है।
राहुल बडेरा की एक जून को हुई थी गिरफ्तारी
न्यायालय
में पेश किए गए रिकॉर्ड के अनुसार, ईडी ने राहुल बडेरा को 1 जून 2026 को
गिरफ्तार किया था। इससे पहले 25 जून 2024 को मामला दर्ज किया गया था।
रिकॉर्ड में उसके खिलाफ आपराधिक प्रकरण भी दर्ज होने का उल्लेख है।
जमानत
याचिका में राहुल बडेरा की ओर से दलील दी गई थी कि उसने जांच में पूरा
सहयोग किया है, जांच पूरी हो चुकी है और 24 जुलाई को परिवाद भी दाखिल किया
जा चुका है, इसलिए अब उसे हिरासत में रखने की जरूरत नहीं है। यह भी तर्क
दिया गया कि पूर्व के मामलों में उसे उच्च न्यायालय से जमानत मिल चुकी है।
इस पर ईडी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता चंदन ऐरन ने तर्क रखे और विरोध किया।
न्यायालय
ने पीएमएलए की धारा 45 के प्रावधानों और उच्चतम न्यायालय के विभिन्न
फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि जमानत के स्तर पर आरोपित को यह दिखाना
होता है कि प्रथम दृष्टया वह अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर रिहा होने
के बाद दोबारा अपराध करने की संभावना नहीं है।
अदालत ने रिकॉर्ड में
मौजूद सामग्री के आधार पर कहा कि नगर निगम में फर्जी टेंडर और वर्क ऑर्डर
के जरिए करीब 103 करोड़ रुपये की सरकारी राशि के अपराध की आय होने का आरोप
है। अपराधों की संख्या, कथित आर्थिक अपराध की गंभीरता और उसके सामाजिक
प्रभाव को देखते हुए राहुल बडेरा को जमानत देना कानून सम्मत नहीं है। उसकी
जमानत अर्जी खारिज कर दी गई।
अभय सिंह राठौर पर भी फर्जी टेंडर में भूमिका का आरोप
दूसरे
मामले में आरोपित अभय सिंह राठौर की ओर से दलील दी गई कि वह नगर निगम
इंदौर के ड्रेनेज विभाग में इंजीनियर के पद पर कार्यरत था और उसके खिलाफ
लगाए गए आरोप गलत हैं। उसकी ओर से भी जांच पूरी होने और लंबे समय से हिरासत
में होने का हवाला देकर जमानत मांगी गई थी। ईडी ने इसका विरोध करते हुए
आरोप लगाया कि अभय सिंह राठौर ने जिम्मेदार अधिकारी रहते हुए अन्य
सह-आरोपितों के साथ मिलकर फर्जी टेंडर और वर्क ऑर्डर जारी किए तथा सरकारी
राशि को आपस में बांटा। जांच एजेंसी ने इसे गंभीर आर्थिक अपराध बताते हुए
कहा कि जमानत मिलने पर आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकता है।
संपत्तियों और बैंक खातों में रकम का भी रिकॉर्ड
न्यायालय
ने ईडी की ओर से पेश परिवाद और दस्तावेजों का अवलोकन करते हुए कहा कि
मामले में कथित अपराध से अर्जित राशि से खरीदी गई अचल संपत्तियों का विवरण
और आरोपितों के बैंक खातों में जमा रकम का विस्तृत ब्यौरा भी रिकॉर्ड पर
मौजूद है। न्यायालय ने माना कि उपलब्ध सामग्री और पीएमएलए की धारा 45 के
प्रावधानों को देखते हुए अभय सिंह राठौर को भी जमानत का लाभ दिया जाना उचित
नहीं है। उसकी जमानत अर्जी भी खारिज कर दी गई। न्यायालय ने मामले को
अभियोजन की अनुमति, प्रस्तुति और संज्ञान पर बहस के लिए 21 सितंबर 2026 को
पेश करने के निर्देश दिए हैं।













