वन प्रबंधन में आधुनिक तकनीक और स्थानीय ज्ञान का मेल जरूरी: भूपेंद्र यादव
नई दिल्ली, केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने शुक्रवार को कहा कि वन प्रबंधन को प्रभावी बनाने के लिए क्षेत्र की जरूरतों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप क्षमता निर्माण जरूरी है। प्रशिक्षण में स्थानीय ज्ञान के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नई तकनीकों को शामिल किया जाना चाहिए।
जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी के सहयोग से शुक्रवार को आयोजित ‘कैपेसिटी एन्हांसमेंट फॉर इफेक्टिव फॉरेस्ट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट’ पर कार्यशाला का शुभारंभ करते हुए उन्होंने कहा कि वन जलवायु परिवर्तन से निपटने, जैव विविधता के संरक्षण और वन पर निर्भर समुदायों की आजीविका के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसलिए अग्रिम पंक्ति के वनकर्मियों की परिचालन और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर क्षमता बढ़ाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि वनाग्नि प्रबंधन आज वैश्विक चुनौती बन चुका है। ऐसे में परियोजना के माध्यम से वनाग्नि प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु कार्रवाई के क्षेत्र में तकनीकी और जमीनी क्षमताओं को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि क्षमता निर्माण केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि आधुनिक तकनीकों और जमीनी स्तर की सफल कार्यप्रणालियों को प्रशिक्षण का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
मंत्री ने क्षेत्र विशेष के लिए अलग-अलग क्षमता निर्माण मॉड्यूल तैयार करने पर जोर दिया। इन मॉड्यूल में स्थानीय ज्ञान और क्षेत्रीय चुनौतियों को शामिल करने की बात कही गई। परियोजना के तहत व्यावहारिक तकनीकी समाधान विकसित करने के लिए अनुसंधान एवं विकास, जमीनी स्तर पर तकनीकों के इस्तेमाल के लिए पायलट परियोजनाएं और प्रशिक्षण संस्थानों को मजबूत करने जैसे काम किए जाएंगे। इसके अलावा सार्क और अन्य विकासशील देशों के साथ बेहतर कार्यप्रणालियों को साझा करने पर भी जोर दिया जाएगा।
जीका इंडिया के वरिष्ठ प्रतिनिधि ईजी वाकामात्सु ने कहा कि यह परियोजना भारतीय और जापानी शोध संस्थानों को एक साथ लाकर वन प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और क्षमता निर्माण से जुड़ी वैश्विक चुनौतियों के समाधान विकसित करने का मंच बनेगी। उन्होंने बताया कि वन क्षेत्र में जीका की भारत के साथ साझेदारी करीब तीन दशक पुरानी है और इससे सात लाख से अधिक लोगों को लाभ मिला है। परियोजना के दूसरे चरण में लकड़ी के बेहतर उपयोग और आजीविका सृजन, डिजिटल तकनीक के माध्यम से वन प्रबंधन में सुधार तथा संयुक्त अकादमिक अनुसंधान पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
कार्यशाला के दौरान परियोजना की रूपरेखा और सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों पर आधारित पुस्तिका भी जारी की गई। तकनीकी सत्र में मंत्रालय ने परियोजना के उद्देश्यों और दायरे की जानकारी दी। इसके बाद जीका के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे और राज्यों, शोध संस्थानों तथा केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद हुआ।
सात साल की यह परियोजना 2025-26 से 2031-32 तक चलेगी। इसका कुल बजट 537.10 करोड़ रुपये है। इसमें जीका की ओर से 440.42 करोड़ रुपये और भारत सरकार की ओर से 96.68 करोड़ रुपये का योगदान है। परियोजना में देश के सभी राज्यों को शामिल किया जाएगा। नए राज्यों को प्राथमिकता देने के साथ पहले की संबंधित परियोजना में शामिल राज्यों को भी सहयोग दिया जाएगा।















