ऋतब्रत के विपक्ष के नेता की मान्यता विवाद पर कलकत्ता हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
कोलकाता, पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में ऋतब्रत बंद्योपाध्याय को मान्यता दिए जाने के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। न्यायमूर्ति कृष्णा राव की एकल पीठ ने बुधवार को सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रखा। मामले को लेकर अदालत की टिप्पणियां विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका और निर्णय प्रक्रिया पर कई महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न खड़े करती हैं।
यह मामला तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष के उस निर्णय को चुनौती दी गई है, जिसके तहत बागी विधायक ऋतब्रत बंद्योपाध्याय को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी गई थी। याचिकाकर्ता पक्ष का दावा है कि विधायक दल के बहुमत ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय के नाम का समर्थन किया था, इसके बावजूद अध्यक्ष ने दूसरे प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने बार-बार यह जानना चाहा कि यदि किसी दल के बहुमत विधायक किसी व्यक्ति के नाम का प्रस्ताव करते हैं, तो विधानसभा अध्यक्ष उसे अस्वीकार कर किसी अन्य व्यक्ति को विपक्ष का नेता किस आधार पर नियुक्त कर सकते हैं। अदालत ने यह भी पूछा कि जब अलग-अलग प्रस्ताव अध्यक्ष के समक्ष आए, तब उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी क्या थी और उन्होंने निर्णय लेने में देरी क्यों की।
विधानसभा अध्यक्ष की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत को बताया था कि मामले में 6 मई और 19 मई के दो अलग-अलग प्रस्ताव प्राप्त हुए थे। कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों को लेकर विवाद उत्पन्न होने के बाद शिकायत दर्ज हुई और जांच शुरू की गई। उनका कहना था कि अध्यक्ष को प्राप्त कुछ दस्तावेजों में मौजूद हस्ताक्षर विधानसभा के आधिकारिक अभिलेखों से मेल नहीं खाते थे, इसलिए परिस्थितियों को देखते हुए निर्णय लिया गया।
हालांकि अदालत ने इस तर्क पर भी सवाल उठाए और पूछा कि यदि प्रारंभिक प्रस्ताव पहले ही प्राप्त हो चुका था तो उस पर तत्काल निर्णय क्यों नहीं लिया गया। न्यायालय ने यह भी जानना चाहा कि जिस प्रस्ताव के आधार पर ऋतब्रत बंद्योपाध्याय को विपक्ष का नेता माना गया, वह वास्तव में किस समूह द्वारा प्रस्तुत किया गया था।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंद्योपाध्याय ने अंतरिम राहत की मांग करते हुए कहा कि बाद की राजनीतिक घटनाओं ने विवाद को और जटिल बना दिया है। वहीं अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाद केवल हस्ताक्षरों या प्रस्तावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी जांच का विषय है कि विधानसभा अध्यक्ष ने अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग किस प्रकार किया।
सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।















