पटना (PATNA): सियासत में कभी-कभी एक छोटा-सा दृश्य बड़ा राजनीतिक संदेश बन जाता है और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने यही कर दिखाया। ‘कार्यकर्ता सम्मान जनता दरबार’ के दौरान एक मुस्लिम कार्यकर्ता द्वारा दिए गए अंगवस्त्र को उन्होंने सम्मान के साथ गले में डाला, लेकिन टोपी पहनने से इनकार कर दिया। यही एक क्षण अब पूरे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है।


‘संघी चेहरे’ की कमी को मिली जहग

यह महज शिष्टाचार या व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे एक सधे हुए ‘संकट प्रबंधन’ और गहरे राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। भाजपा के भीतर लंबे समय से जिस ‘संघी चेहरे’ की कमी को लेकर हल्की असहजता थी, सम्राट चौधरी के इस कदम ने उस खालीपन को काफी हद तक भरने का काम किया है। 
दरअसल, सम्राट चौधरी सीधे तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की पृष्ठभूमि से नहीं आते, लेकिन बीते कुछ समय में उनके फैसलों, भाषा और सार्वजनिक आचरण में एक स्पष्ट वैचारिक झुकाव दिखाई देने लगा है।

 ‘दोहरी संदेश रणनीति’ 

राजनीतिक जानकार लव कुमार मिश्र इसे ‘दोहरी संदेश रणनीति’ बता रहे हैं। उनका मानना है कि यह सामाजिक समावेश का संदेश है, जहां उन्होंने मुस्लिम कार्यकर्ता के सम्मान को स्वीकार किया। वहीं अपने कोर समर्थक वर्ग और संघ के वैचारिक ढांचे को यह भरोसा दिलाया कि मूल लाइन से कोई विचलन नहीं होगा।

बिहार में संगठन और विचारधारा के बीच संतुलन हमेशा एक चुनौती रहा है: 

भाजपा-संघ के रिश्तों के लिहाज से यह क्षण इसलिए भी अहम है, क्योंकि बिहार में संगठन और विचारधारा के बीच संतुलन हमेशा एक चुनौती रहा है। ऐसे में सम्राट चौधरी का यह कदम न केवल अंदरूनी असंतोष को शांत करने वाला माना जा रहा है, बल्कि उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करता है, जो संकेतों की राजनीति को बखूबी समझता है।

‘मैसेज पॉलिटिक्स’ के कुशल खिलाड़ी बने सम्राट 

सम्राट चौधरी अब सिर्फ सत्ता चलाने वाले मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि ‘मैसेज पॉलिटिक्स’ के कुशल खिलाड़ी बन चुके हैं, जो बिना बोले, बिना टकराव, अपने हर कदम से सियासी दिशा तय कर रहे हैं। आने वाले चुनावी दौर में उनका यही संतुलन भाजपा और संघ के समीकरणों को नई धार देगा।